Friday, 23 September 2011

आंसू



कल बड़ी देर तक
एक आंसू
मेरी आँख की कोर पर
अटका रहा
भरमाया सा
कई रोज़ बाद
तुझे देखा था
शायद इसलिए भी
पगला है .....
आज फिर
न जाने कितनी देर तलक
तेरी राह जोहता रहा

वाकई पागल है
तभी तो - आंसू है
बौराया सा .....

गुंजन
१६/९/११

Wednesday, 21 September 2011

तुम्हारे लिए .......



रात होते ही
सितारों को टांग देती हूँ " मैं "
आसमान में हाथ बढ़ा कर
तुम्हारे लिए .......
मैं नहीं तो मेरे दुपट्टे के
सितारे ही सही
कोई तो हो जिनसे लिपट कर
तुम चैन की नींद सो पाओ .....

गुंजन
१६/९/११

Tuesday, 20 September 2011

घमंडी यादें



प्रश्न तो वहीँ खड़ा है ना
यक्ष की भांति .... अनुत्तरित
ये यादें होती ही क्यूँ हैं .. ?
किसी के जाने के साथ
ये भी क्यूँ नहीं चली जातीं
क्यूँ नहीं जीने देती ये हमें
क्या रात ... क्या दिन .. !!
नहीं है हमें इनकी ज़रूरत
आखिर क्यूँ नहीं समझतीं .. ?
जब भी बेशर्म बन धकेलते हैं
हम इन्हें दरवाजे से बाहर
ये उतनी ही द्रुत गति से
पलट वार करती हैं
क्या दुसरे ... क्या तीसरे ... और क्या चौथे
जिस पहर भी आँख खुले
ये मुहँ बाये सामने खड़ी होती हैं
क्यूँ......?

___________

कहा ना ... चली जाओ
जिसके साथ तुम आयीं थीं
उसी के पास .. वापिस
तुम्हारे ना होने पर भी
मैं अकेली नहीं ......

समझना होगा तुम्हें
मेरा "मैं" मेरे पास है
और उसे कोई नहीं छीन सकता मुझसे
स्वयं ... तुम भी नहीं

....घमंडी यादें !!!!!!!

गुन्जन
२०/९/११

Monday, 19 September 2011

मैं तुमसे प्यार करती हूँ



तुम्हें छू कर
तुमसे गुज़रती हूँ
न जाने क्यूँ ?
मैं ..... तुमसे
इतना प्यार करती हूँ

गुंजन
19/9/11

Sunday, 18 September 2011

उलझी हुई गुत्थियाँ



कभी कभी सोचती हूँ
तो लगता है कि
ये गुत्थियाँ उलझी ही रहें
तो बेहतर है
सुलझे हुए ज़ज्बात कभी कभी
उलझा जाते हैं
खुद ही को
एक खालीपन का एहसास
छोड़ जाते हैं हम ही में कहीं
कि अब क्या...?
कि अब क्या बचा है ....... नया करने को

बेहतर है इसकी उलझी गांठों में
ढुंढते रहें हम बीते दिनों को
..... अच्छे या बुरे
जैसे भी हैं - आखिर अपने तो हैं
जो ये भी सुलझ जायें
तो गांठ (जेब) में बचेगा क्या .... ?
.... निरा खालीपन !!
.... सूनापन !!

जो तुम्हारे आने से पहले था - जीवन में
या था भी ...... पता नहीं

गुन्जन
१६/९/११

Friday, 16 September 2011

मौन के भी शब्द होते हैं



हाँ मौन के भी "शब्द" होते हैं
और बेहद मुखर भी
चुन -चुन कर आते हैं ये उस अँधेरे से
जहाँ मौन ख़ामोशी से पसरा रहता है
बिना शिकायत -
बैठे-बैठे न जाने क्या बुनता रहता है .. ?
शायद शब्दों का ताना-बना

और ये शब्द विस्मित कर देते हैं
तब.... जब वो सामने आते हैं
प्रेम की एक नयी परिभाषा गढ़ते हुए
अथाह सागर ... असीमित मरुस्थल ... जलद व्योम
न जाने कितना कुछ
अपने में समेटे हुए .. छिपाए हुए
ओह ...... !!

जब सुना था उन्हें .... तब रो पड़ी थी मैं
हाँ मौन के भी शब्द होते हैं
और बेहद मुखर भी
कभी सुनना उन्हें
रो दोगे तुम भी ...... जानती हूँ मैं
अभी भी कितना कुछ समेटे हैं अपने भीतर
भला तुम क्या जानो .. ?

गुन्जन
१६/९/११

Thursday, 15 September 2011

मैं बोनसाई नहीं ..... कदम्ब हूँ !!



तो आपको क्या लगता है...?
क्या मेरे शब्दों में
मेरे भावों में वो गहराई है..?
निश्चय ही - मेरे शब्द बोनसाई नहीं हैं
क्यूंकि भावों की कोम्पलें
नित नवीन प्रफुल्लित होती हैं ..
जडें भी बहुत गहरे तक हैं कहीं -
शायद इसलिए भी
_________

अब छांट भी तो नहीं सकती
वर्ना छिपे दर्द टीसने लगेंगे..

मैं चिनार नहीं
.........कदम्ब हूँ !!

जिसने अपने आगोश में
प्रेम की पराकाष्ठता को लिया था
इसलिए मैं बोनसाई बन ही नहीं सकती
बनना भी नहीं चाहती

निह्श्चय ही प्रेम विराट है
और द्रड़ भी.....
....... अब भी कोई शक है क्या ?

गुन्जन
१४/९/११