Monday, 1 August 2011

चोर मन........



क्यूँ दिन-रात जला करता है
ये मन मेरा
शायद
_______

तुझ में जलते सूरज की तपिश
वो चुरा लाया है
चोर जो ठहरा
ये कमबख्त - मन मेरा_______

गुंजन
२/८/११

4 comments:

  1. बहुत ही खूबसूरत रचना,

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  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.....

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