Thursday, 8 December 2011

बर्फ, सपने और .. प्यार



तुम्हारे घर की ढालू छत से पिघलती
बर्फ की कांच सी पारदर्शी बूंदें
कंगूरे बन सज जाती हैं
मेरे मन के किनारों पर ..

फिर इन महीन कांच के कंगूरों पर
सजाती हूँ मैं अपने सपने
नन्हे - नन्हे .. दीप जैसे
कुछ - कुछ तुम जैसे
कुछ - कुछ मुझ जैसे

अधूरे .. पिघलते हुए
ठंडी बर्फ की मन्दिद
खुद ही में घुलते हुए
________

क्या होंगे वो पूरे .. ?
तुमसे जुड़े मेरे कुछ अनचीन्हे से सपने !!
तुम्हारे घर की ढालू छत पर
कभी तो पिघलेंगे वो
हाँ जब हमारे प्यार की
लजीली - सजीली धुप निकलेगी
हाँ तब ..
हाँ शायद .. तब

गुंजन
६/१२/११

13 comments:

  1. कल 09/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    पिछले कमेन्ट मे गलत तारीख देने के लिए क्षमा चाहता हूँ।

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  2. बहुत खूबसूरत ख्यालों को पिरोया है।

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  3. तुम्हारे घर की ढालू छत से पिघलती
    बर्फ की कांच सी पारदर्शी बूंदें
    कंगूरे बन सज जाती हैं
    मेरे मन के किनारों पर ..
    दिल को छू हर एक पंक्ति.... हर बार की तरह.....

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  4. bahut sundar

    www.poeticprakash.com

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  5. वाह ...बहुत ही बढि़या।

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  6. आह ...कितने सुन्दर शब्द और भावो में परिभाषित कर दिया ...उम्दा

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  7. वाह,कोमल और सुन्दर बिम्ब उँकेरे है,शब्दों और अहसासों से।

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  8. क्या होंगे वो पूरे .. ?
    तुमसे जुड़े मेरे कुछ अनचीन्हे से सपने !!
    तुम्हारे घर की ढालू छत पर
    कभी तो पिघलेंगे वो
    हाँ जब हमारे प्यार की
    लजीली - सजीली धुप निकलेगी
    हाँ तब ..
    हाँ शायद .. तब
    ..sapanon ka koi ant nahi...
    bahut sundar sunhali rachna..

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  9. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  10. gunjan...
    apki kai rachnaayen padh dali hain...!
    comment(tippani) karne ka man nahin ho raha hai...bas shbdon ko kahin bheeter tak mahsoos kar rahi hun...!!
    maaf karen....!!

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