Wednesday, 28 December 2011

नारी जीवन का सार



क्यूँ बदलती हो खुद को तुम इतना
बार बार .. यूँ ही
तुम जैसी हो .. वैसी क्या कम हो
जो इतने रंगों को पहन लेती हो
अपनी आँखों में .. सतरंगी खवाब बुन कर
कभी नदिया का किनारा बन ..
कभी किसी पहाड़ का सहारा बन ..
तो कभी बिखर जाती हो .. हरी-पीली दूब बन
पर तुम्हारी आंखें जाने क्यूँ चुप सी रहा करती हैं .. ?
जैसे ठहरी हो उसमें तुम्हारे बचपन की कोई हंसी
और .. और .. तुम्हारी काली भवों के बीच
वो जो चवन्नी भर कर सिंदूर है
अहा .... कैसे आंखें जुड़ा जाता है
जानती हो हमेशा से देखा करती थी मैं तुम्हें
इन्हीं सिंदूरी वस्त्रों में ..
.. और खुद को भी

इसलिए ही तो पहचान हो तुम मेरी
हाँ मान हो तुम .. मेरी

गुंजन
२७/१२/११

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना !
    मेरी नई पोस्ट पे आपका हार्दिक स्वागत है !

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

    भावों का मधुर गुंजन करती.

    आनेवाले नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,गुंजन जी.

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  3. नारी को समर्पित एक सुन्दर कविता..
    ritu bansal
    kalamdaan.blogspot.com

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  4. बहुत ही खूबसूरत एहसास ...

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  5. सुन्दर प्रस्तुति।

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  6. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-743:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  7. बेहद खूबसूरत कविता..

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