Tuesday, 22 November 2011
...काश
अपनी ज़िन्दगी को
अपने हिसाब से जीने की
शर्त रखी थी ना तुमने
जी भी रहे हो .....
अब फिर कैसी शिकायत
_______
टूटी हुई मुंडेर पर बैठी
इक नन्ही चिड़िया को
डराया था तुमने उसकी
..... एक नादानी पर
हवाओं का रुख मोड़ दिया था
तुमने अपनी .... जिद के आगे
समंदर की बेचैन लहरें भी
तुम्हारे तेज़ से सहम
...... परे हट गयी थीं
अपनी अकुलाहट को ताक़ पर धर
अपने में ही सिमट कर रह गयीं थीं
काश की ये सब न हुआ होता
काश की तुम वक़्त रहते जान जाते
काश की ये होता
काश की वो होता
अब इस काश के सिवा बचा ही क्या है
मेरे पास !!
कुछ भी , कैसे भी करके
अब इस काश को पूरा नहीं कर सकती मैं ...काश
गुंजन
४/११/११ —
पुकार
इतनी पुकार पर तो
सूरज का घमंड भी
..... पिघलने लगा
पर तुम्हें न पिघलना था
और न पिघले कान्हा .. !!
गुंजन
११/११
बोलो ...... चलोगे क्या ?
आज मन फिर कुछ लिखने को हो रहा है
क्या ..... पता नहीं
क्यूंकि लिखने का मतलब लिखना नहीं
उन शब्दों में तुमको -
तुम्हारे साथ जीना होता है
हर रोज़ जब कुछ लिखती हूँ
तो लगता है की हाँ आज तुम्हारे साथ
..... कुछ कदम चल ली
..... तुम्हारे रु-ब-रु हो ली
जिस दिन शब्द खो जाते हैं
तो लगता है कि तुम रूठ गए ..
मन है आज फिर
तुम संग दो कदम चलने का
बोलो ...... चलोगे क्या ..... !!
गुंजन
१४/११/११
कोई और नहीं है ....... कृष्णा !!
कभी चाहूँ तुम - में बसना
कभी चाहूँ तुम - सी बनना
कभी चाहूँ जी - लूँ तुमको
कभी चाहूँ पा - लूँ तुमको
हर रंग में
हर रूप में
हर चाह में
हर राह में
बस तुम हो
तुम्हीं हो
कोई और नहीं है
....... कृष्णा !!
गुँजन
२१/१०/११
Tuesday, 15 November 2011
खुबसूरत तोहफा
इतना आरोप, इतना संदेह
क्यूँ ..... ?
प्रश्न तो मुझे करने चाहिए ?
आक्षेप तो मुझे करना चाहिए ?
जीवन तो मेरा बदला है ना ?
तुम्हारा कहाँ .. ?
फिर भी हमेशा की तरह कटघरे में
मैं ही क्यूँ .... ?
________
क्या मेरा दर्द ... मेरे आँसू
सब बेमानी हैं !!
हाँ कह दो कि - सब खुबसूरत धोखा हैं
ओह्ह्ह्ह !!!!!
बेहतरीन तोहफा दे दिया ... तुमने तो मुझे आज
वो भी ज़िन्दगी के इस मोड़ पर आकर
तुमसे तो ये उम्मीद ना थी
ना ... कभी नहीं
कभी भी नहीं ....... !!
..... १५/११/११
Monday, 14 November 2011
मृत्यु ....
मृत्यु को कितनी बार
आमंत्रित किया है मैंने
खुद भी नहीं जानती
_______
आज फिर से तुम्हारा
आह्वाहन कर रही हूँ
आओगी क्या मुझे लिवाने
मेरी मृत्यु ..... !!
.....
१४/११
Sunday, 13 November 2011
कृष्ण का अन्तर्द्वंद
व्याकुल हो ना कृष्णा
क्यूंकि चाह कर भी
वो कह नहीं पाते
.... जो कहना चाहते हो
तुम्हारा अन्तर्द्वंद रोक लेता है तुम्हें
आखिर कृष्ण हो ना ..
देवता बनने के लिए
कोई तो बलिदान देना ही होगा
वही दिया भी !!
__________
और राधा ..
इस धरा पर बरसों से
प्रेम का मूर्त रूप
तो भला उसकी आँखों में
व्याकुलता कैसी ?
अगर है भी ....... तो बस
अपने कृष्ण की अकुलाहट को सुनने की
उनके मौन को समझ पाने की
अब तो मौन तोड़ो कृष्णा ....... !!
.. २२/१०/११
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