Thursday, 8 December 2011

बर्फ, सपने और .. प्यार



तुम्हारे घर की ढालू छत से पिघलती
बर्फ की कांच सी पारदर्शी बूंदें
कंगूरे बन सज जाती हैं
मेरे मन के किनारों पर ..

फिर इन महीन कांच के कंगूरों पर
सजाती हूँ मैं अपने सपने
नन्हे - नन्हे .. दीप जैसे
कुछ - कुछ तुम जैसे
कुछ - कुछ मुझ जैसे

अधूरे .. पिघलते हुए
ठंडी बर्फ की मन्दिद
खुद ही में घुलते हुए
________

क्या होंगे वो पूरे .. ?
तुमसे जुड़े मेरे कुछ अनचीन्हे से सपने !!
तुम्हारे घर की ढालू छत पर
कभी तो पिघलेंगे वो
हाँ जब हमारे प्यार की
लजीली - सजीली धुप निकलेगी
हाँ तब ..
हाँ शायद .. तब

गुंजन
६/१२/११

Tuesday, 6 December 2011

क्यूंकि मैं " गुंजन " हूँ



परी की तरह तो मैं भी पली
... पाल भी रही हूँ
संस्कारों की चाभी तो मुझे में भी भरी गयी
..... भर भी रही हूँ
पर मैं भी हूँ .... हाँ मैं हूँ
ये ना जाने क्यूँ .. कभी भूल ही ना पाई
अब तो याद भी नहीं कि
किसने क्या कहा ... क्या सिखाया
पर खुद को हमेशा जाना .. हमेशा समझा
खुद का होना शायद दुनिया के
ना चाहते हुए भी उन पर
ज़बरदस्ती थोपा
और आज मैं हूँ .. हाँ मैं हूँ
.....
दुनिया के ना - हाँ चाहते हुए भी
दुनिया के ना - हाँ के बीच में भी
अपने अस्तित्व
अपने पूर्ण रुपेर्ण स्वाभिमान के साथ
मैं हूँ ..
हाँ मैं हूँ ..
क्यूंकि मैं " गुंजन " हूँ

गुंजन
७/१२/११

Wednesday, 30 November 2011

प्रथम उड़न



एक दिन तो होना ही था तुम्हें पूर्ण
लगता है आज वो दिन आ गया
अपने खो गए आत्मबल को
आज मैंने भी .. पा लिया
जिस दिन तुम बिन जीने की कल्पना की थी
कुछ ऐसा ही अविकल .. बेचैन
निराशा से भरा पल था वो
_________

पर तुम्हारे लिए ..
निश्चित ही एक नयी उड़ान
असीम आकाश में तुम जैसे
नादान परिंदे की - प्रथम उड़न
चलो जो भी हो .. तुमने अपने पंख फैलाये तो
खुद को मुझ से मुक्त कर
अपने नये आयाम .. बनाये तो

जाओ खुश रहो .. जहाँ रहो .. जैसे भी रहो
सुखी , संतुष्ट और संपन्न रहो

गुंजन
३०/११/११

Tuesday, 29 November 2011

मन की किरचें



क्या कभी मन की किरचों से दो-चार हुए हैं आप .. ?
मैं हुई हूँ .... और हर रोज़ होती हूँ

नन्ही - नन्हीं किरचें ... जिन्हें हम
अस्तित्वहीन समझ झुठला देते हैं
वो कब अंदर ही अंदर हमें लहू - लुहान कर देती हैं
हम जान भी नहीं पाते
पर जब भावनाओं का ज्वार - भाटा
पूरे वेग से हमें अपने नमकीन पानी में
बहा ले जाता हैं .... तब उन अस्तित्वहीन
किरचों का अहसास होता है हमें

क्यूँ नहीं उन्हें हम पहले ही बीन लेते .. ?
आखिर क्यूँ उन्हें हम अपने मन में जगह दे देते हैं .. ?
क्यूँ भूल जाते हैं कि पाहुना दो दिन को आये
तब ही तक भला लगता है
पर जब पावँ पसार डेरा जमा ले
तब घर क्या .. !! द्वार क्या .. !!
सब समेट कर ले जाता है - अपने साथ
और हम रीते हाथों द्वार थामे .
..... खड़े के खड़े रह जाते हैं !!


गुंजन
२९/११/११

Friday, 25 November 2011

पहाड़ों की .. रानी



कुछ पीले ... कुछ गीले
कुछ हरे से हैं मेरे पहाड़
और इनकी पथरीली छतों पर सूखती हूँ मैं
हाँ कभी कभी एक टुकड़ा धूप बन जाती हूँ .. "मैं"

कभी इजा के बोलों में
कभी बाबा के श्लोकों में
कभी अम्मा की गाली में
तो कभी सरुली की ठिठोली में
ना जाने कितने सुरों में ढल जाती हूँ .. "मैं"

कभी खेतों में रोटी ले जाती हूँ मैं
तो कभी पुरानी उधरी ऊन से
मोजा बीनने लग जाती हूँ मैं
कभी पत्थरों से पटी छतों पर
बड़ी-पापड़ तोड़ने बैठ जाती हूँ मैं
ना जाने कितने रूपों में ढल जाती हूँ .. "मैं"

कभी आमा की कच्ची रसोई में
बड़ी निर्लजता से घुस आती हूँ मैं
तो कभी एक - वस्त्रा बन
बोदी का कर्त्तव्य निभाती हूँ मैं
कभी दही सने नीबुओं से
भाई बहनों को ललचाती हूँ मैं
तो कभी अन्नपूर्णा बन बिन बुलाये
मेहमानों की पंगत जिमाती हूँ मैं
ना जाने कितने रंगों में रंग जाती हूँ .. "मैं"

कभी ढोलक पर पड़ती चौड़े हाथों की थाप
तो कभी बेटी को विदा करती इजा का विलाप
हर रंग में .. हर रूप में .. हर सुर में .. हर ताल में
जब चाहूँ तब इन पहाड़ों की "रानी" बन जाती हूँ .. "मैं"

गुंजन
२४/११/११

Tuesday, 22 November 2011

इंतज़ार ही रहो तो अच्छा है ..



ना !!!!!!!
तुम सपना .... न बनना
सपने रात के बीतते - बीतते
टूट जाते हैं.....
बादल भी ना बनना
इक बार बरस के
वो भी चूक जाते हैं
इंतज़ार ही रहो तो
.. अच्छा है
क्यूंकि वो कभी -
कहीं नहीं जाता
हरदम साथ रहता है
" तुम " बन कर
तुम्हारा कभी ना ख़त्म होने वाला
इंतज़ार बन कर

हाँ .. मुझे है तुम्हारा इंतज़ार
हमेशा की तरह
ख्वाबों में ही सही
पर तुम्हें पाने का .... इंतज़ार !!

गुन्जन
३/१०/११

प्यार का अंतहीन सफ़र ....



न सवालों का ज़वाब दो
न जवाबों से सवाल पूछो
अपने आप सारे प्रश्न चिन्ह
सिमट जायेंगे
और तुम फिर स्वतंत्र हो जाओगे
अपने आयामों को नापने के लिए
न बनो इस अंतहीन सफ़र के मुसाफिर
ये सफ़र विक्षिप्त कर देता है
सारी संवेदनाओं को
छिन्न-भिन्न कर देता है
जीते जी मानवीय इक़छाओं को
नरक में ला खड़ा करता है

क्यूंकि
इस सफ़र का ना कोई
..... आदि है
..... ना अंत

गुन्जन
१४/९/११