Tuesday, 6 December 2011
क्यूंकि मैं " गुंजन " हूँ
परी की तरह तो मैं भी पली
... पाल भी रही हूँ
संस्कारों की चाभी तो मुझे में भी भरी गयी
..... भर भी रही हूँ
पर मैं भी हूँ .... हाँ मैं हूँ
ये ना जाने क्यूँ .. कभी भूल ही ना पाई
अब तो याद भी नहीं कि
किसने क्या कहा ... क्या सिखाया
पर खुद को हमेशा जाना .. हमेशा समझा
खुद का होना शायद दुनिया के
ना चाहते हुए भी उन पर
ज़बरदस्ती थोपा
और आज मैं हूँ .. हाँ मैं हूँ
.....
दुनिया के ना - हाँ चाहते हुए भी
दुनिया के ना - हाँ के बीच में भी
अपने अस्तित्व
अपने पूर्ण रुपेर्ण स्वाभिमान के साथ
मैं हूँ ..
हाँ मैं हूँ ..
क्यूंकि मैं " गुंजन " हूँ
गुंजन
७/१२/११
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स्थापित किया खुद को ...खूबसूरती से ...!!
ReplyDeleteगुंजित किया स्वयं को सुंदर राग से ...!!
सुंदर रचना ...!!
अपने स्वाभिमान के साथ खुद को प्रस्तुत किया ...अच्छी अभिव्यक्ति
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteबेहतरीन अभिव्यक्ति ..
ReplyDeleteअपनी पहचान को बताती रचना ..
ReplyDeleteअपनी पहचान की बेहतरीन अभिव्यक्ति..... ये आप ही कर सकती है क्यों की आप ही "गुंजन" है.....
ReplyDeletekhubsurat....khud se khud ka parichay karwati rachna
ReplyDeleteदुनिया के ना - हाँ चाहते हुए भी
ReplyDeleteदुनिया के ना - हाँ के बीच में भी
अपने अस्तित्व
अपने पूर्ण रुपेर्ण स्वाभिमान के साथ
मैं हूँ ..
हाँ मैं हूँ ..
क्यूंकि मैं " गुंजन " हूँ
...yahi vyshwas apne mein har ek ko hona chahiye..
bahut hi sundar sakaratmak rachna..
परी की तरह तो मैं भी पली
ReplyDelete... पाल भी रही हूँ
संस्कारों की चाभी तो मुझे में भी भरी गयी
..... भर भी रही हूँ..
dil ko chhu liya.. awesome gunjan ji.. jitni tarif karn kam hai