Sunday, 8 January 2012
पर जैसा भी था मन का पक्का और सच्चा था .. और है भी
ये ५ और ६ जनवरी
रोज़ क्यूँ नहीं आती
सुना .. तुम रोज़ क्यूँ नहीं आतीं ?
रोज़ आओ तो शायद
वो भी आ जाये
अपनी धुआं उड़ाती हंसी के साथ
खुद भी ना जाने कहाँ डूबते-उतराते
ज़िन्दगी को हर्फों में जीना
और हवा में उड़ा देना
बस यही तरीका था उसका
और है भी ..
मुझे भी तो बस शब्दों में ही जिया
पढ़ता और तह करके रखता जाता
अपनी किताबों के डब्बे में
बिना कुछ लिखे
पगला था पर जैसा भी था
मन का पक्का और सच्चा था
और है भी ..
कभी-कभी सोचती हूँ
अगर कुछ लिख देता
तो शायद
शायद नहीं यक़ीनन
आज उसकी किताबों वाले डब्बे से
किताबें चुन उसके घर को
सजा रही होती
और सजा रही होती
दो सपने ..
उसकी और अपनी आँखों में भी
तभी तो
कुछ तारीखें
कुछ बातें
और कुछ शक्लें
भुलाये नहीं भूलतीं
और तुम भी नहीं
कभी नहीं
गुंजन .. ८/१/१२
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आपकी रचनाये तो रोज़ ही बहुत खुबसूरत पढने को मिलती है.....
ReplyDeleteमुझे भी तो बस शब्दों में ही जिया
ReplyDeleteपढ़ता और तह करके रखता जाता
अपनी किताबों के डब्बे में
बिना कुछ लिखे
बहुत सुंदर कोमल भावनाओं की भावाव्यक्ति बधाई
बहुत खूबसूरत
ReplyDeleteवाह! सुन्दर प्रस्तुति.
ReplyDeleteयादों के गुंजन में मशगूल.
५-६ जनवरी लगता है काफी खास रही है ..सुन्दर अभिव्यक्ति
ReplyDeleteuttam chitran .....
ReplyDeleteअच्छी है..!
ReplyDeletekalamdaan.blogspot.com
कुछ यादे ..कुछ तारीखे...कभी नहीं भुलाई जा सकती
ReplyDeleteकुछ यादें तो सही में कभी भुलाई नहीं जा सकती हैं ....
ReplyDeletebahut sundar!!
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