Monday, 1 August 2011
चोर मन........
क्यूँ दिन-रात जला करता है
ये मन मेरा
शायद
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तुझ में जलते सूरज की तपिश
वो चुरा लाया है
चोर जो ठहरा
ये कमबख्त - मन मेरा_______
गुंजन
२/८/११
Thursday, 28 July 2011
यादों के सीले दरख़्त......
यादों के पन्ने अक्सर सील जाते हैं
नमी जो बहुत गहरे तक उतर जाती है
शायद इसलिए भी
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बारिश में अक्सर हर सुखी चीज़ भी सील जाती है
फिर ये तो मन है
जो हमेशा ही भीगा रहता है
सिली हुई यादों के दरख्तों से
खिलती कलियों से लेकर
धरती में धंसी गहरी जड़ों तक.......
गुंजन
२८/७/११
भीगी-सी इक तस्वीर.......
पहली बार जब तुम्हारी तस्वीर खिंची थी.........
मैंने अपनी diary के पन्ने में
तब पन्नों के साथ-साथ
रूह में भी उतर आई थी वो
पता नहीं क्यूँ ....?
रंग तो कभी भर ही नहीं पाई उसमें
क्या कच्चे...... क्या गीले........
_________
बस देखती ही रही थी तुम्हें
इन रंग उड़ी उदास काली आँखों से
उस फीके से चाँद की रौशनी में
हाँ तुम्हारे माथे पर गिरते बालों को ज़रूर संवारा था
मैंने अपनी pencil की नोक से
पर उसी पल चूम भी लिया था तुम्हारी पेशानी को
कि कहीं चुभ न गयी हो......वो कमबख्त नुक
भीगे होठों का गीलापन उभर आया था
तुम्हारे उस चार ऊँगल चौड़े माथे पर
जो आज तक उभरा हुआ है मेरी diary के पन्नों में भी
_________
जो इत्तेफाकन कहीं मिल जाओ
तो दिखाउंगी तुम्हें
पर नहीं....अब तक तो वो भीगे-से पन्ने सील भी गए होंगे
बहुत वक़्त भी तो बीत गया न........
गुंजन
२८/७/११
Wednesday, 27 July 2011
इतिफाक.......
ढूंड रही थी किसी और को
यूँ ही बे-इरादतन -
औ रास्ते में मिल गए आप
एक खुबसूरत से इतिफाक के साथ........
गुंजन
मौजें.....
दिल की मौजें
क्या किसी समंदर में उठती
मौजों से कम होती हैं
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ये तो दर्द का वो दरिया होता है
जिसमें न डूबते बनता है,
न उबरते
सलाम ....सलाम ....सलाम .....
दिल की इन खुबसूरत,
बेहतरीन, बेहिसाब मौजों को
'गुंजन' का सलाम .....
गुंजन
२६/७/११
अब कहते हो ...... शायद
शायद ....शायद......शायद
शायद तो होता है बहुत कुछ
सब अपने मन से ही सोच लिया तुमने
कभी तो
जानने की कोशिश करते तुम
कि मेरी दुनिया
तुम से ही शुरू होती थी
और तुम ही पर ख़त्म भी
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कभी देखा तो होता
कभी जाना तो होता
मैं - मेरा वज़ूद
सब तुमसे ही था
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मैं वो दुनिया देखना चाहती थी
जो तुम्हारी आँखों से नूर बनके बरसती थी
जो तुम्हारे आंगन में लगे तुलसी के चौरे पर
साँझ-सवेरे दिया बन जलती थी
जो तुम्हारे आस-पास बिखरे पानी में
कतरा-कतरा बन ठहरती थी
जो तुम्हारे होठों से लगी cigratte से
धुआं-धुआं बन उड़ जाती थी
जो तुमसे होकर मुझ तक पहुंचती थी
पर तुमने कभी वो सब दिखाया ही नहीं
अपना वो मानिंद हक़ जताया ही नहीं
और अब कहते हो कि शायद.......
गुंजन
२५/७/११
सज़दा........
सज़दे में जो उसके सर झुकाती हूँ
तो तेरे दर पर वो झुक जाता है
जो नज़रों में उसको भरती हूँ
तो तू अश्कों में ढल जाता है
जो हाथों से उसको छूती हूँ
तो तेरे वज़ूद में वो समा जाता है
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अब इसमें मेरी क्या ख़ता है - ए दोस्त
जब मुझे तुझ में ही अपना
माशुके-ख़ुदा नज़र आता है______
गुंजन
२५/७/११
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