Tuesday, 15 November 2011

खुबसूरत तोहफा



इतना आरोप, इतना संदेह
क्यूँ ..... ?
प्रश्न तो मुझे करने चाहिए ?
आक्षेप तो मुझे करना चाहिए ?
जीवन तो मेरा बदला है ना ?
तुम्हारा कहाँ .. ?
फिर भी हमेशा की तरह कटघरे में
मैं ही क्यूँ .... ?
________

क्या मेरा दर्द ... मेरे आँसू
सब बेमानी हैं !!
हाँ कह दो कि - सब खुबसूरत धोखा हैं
ओह्ह्ह्ह !!!!!
बेहतरीन तोहफा दे दिया ... तुमने तो मुझे आज
वो भी ज़िन्दगी के इस मोड़ पर आकर
तुमसे तो ये उम्मीद ना थी
ना ... कभी नहीं
कभी भी नहीं ....... !!

..... १५/११/११

8 comments:

  1. त्रासदी यही है कि अधिकतर कटघरे में वही होता है...जिसका दोष नहीं होता .

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  2. katghare mein hum khud chale jate hain ek ummeed liye ... warna galat ko apni galti ka pata hota hai...

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  3. जीवन तो मेरा बदला है ना ?
    तुम्हारा कहाँ .. ?
    फिर भी हमेशा की तरह कटघरे में
    मैं ही क्यूँ .... ?

    रश्मि जी ने सही कहा है ... कटघरे में हम स्वयं ही चले जाते हैं ... सुन्दर प्रस्तुति

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  4. आखिर कब तक कटघरे मे रहोगी…………तोडना होगा वर्जनाओ को …………अपने लिये आसमान खुद चुनना होगा।

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  5. इस लाजवाब रचना के लिए बधाई



    नीरज

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  6. pata nahi par itne sundar bhavon ke saht kiya gaya sawal nrurtar hi rah jayega ...kyu ki shyad kisi ke pass iska jawab hi nahi hai

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  7. बिना नाम लिए बहुत कुछ कह गई आपकी रचना ... ऐसा क्यों होता है ... ये गलत क्यों होता है ...

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