Monday, 29 August 2011

मकड़ ज़िन्दगी .......




सम्बन्ध क्या होते हैं - नहीं जानती
रिश्ते क्या होते हैं - ये भी नहीं जानती
बस अगर कुछ जाना है
इस छोटे से जीवन में
तो वो निरा-कोरा एक शब्द है___ प्यार

इसी शब्द को लेकर जी है
ये छोटी-सी मकड़ ज़िन्दगी
हाँ जाले भी बुने हैं
मन - भर कर बुने हैं
______

क्यूंकि इसके सिवा
कुछ कर भी तो नहीं सकती थी
कुछ और करने को बचा भी तो नहीं था

तुम बिन __ कृष्ण

गुंजन
४/८/११

Friday, 26 August 2011

फिर वही शब्दों का विहंगम जाल..........




आज फिर शब्द ना जाने क्यूँ चूक से गए हैं
शब्दों का विहंगम जाल
जो मैं हमेशा तुम्हारे आस-पास बुना करती हूँ
खाली प्रतीत होता है
वही शब्द...... कितनी बार दोहराऊँ
अपनी मन:स्तिथि
तुम्हें कितनी बार दिखलाऊँ

उस तुम को........ जो हो कर भी
कहीं है ही नहीं
_________

शब्दों की भी एक सीमा होती है
कहने की भी एक हद होती है
समझते-बूझते
क्यूँ उस 'तुम' को पुकारती हूँ
जो इस जीवन के रहने तलक
मेरा है ही नहीं ........
__________

अपने प्रिय की बात करते-करते
किसी का हृदय बिलखता है
तो किसी की आँखें बोझिल हो जाती हैं
पर मेरे तो अब अहसास तक टीसने लगे हैं
आत्मा का कम्पन निस्तेज़ करने लगा है
इस ____ जीवन को

जीते जी अपने शरीर से अलग होने की व्यथा
शायद किसी ने ना जानी होगी
पर मैं जी रही हूँ
इस सत्यार्थ के साथ

तुम ....... जो हो ही नहीं
उस "तुम्हारे" इंतज़ार के साथ
पर कब तक ............ आखिर कब तक ?

गुंजन
२६/८/११

Monday, 22 August 2011

जन्मों की तृप्ति .......



ओ कृष्णा.........मेरे प्यारे कृष्णा

आज सबने तुम्हें
तुम्हारे जन्मदिन की बधाईयाँ
अपने-अपने तरीके से दीं
और मैं......
मैं पागल जाने कौन सा
अनोखा तरीका खोजने में ही लगी रही
ये भी न जान पाई कि
__________

मेरी एक धुंदली-सी छवि ही
तुम्हें खुशियों से
सराबोर कर देती है
मेरी श्वांस का इक झोंका ही
तुम्हें वन-उपवन के
सारे पुष्पों की खुशबु का
उपहार दे जाता है
मेरी पायल की इक झंकार ही
तुम्हें संगीत के सप्त सुरों से
मदालस कर देती है
मेरे इक पान के बीड़े के आगे
तुम्हारे लिए छप्पन भोग भी
बेस्वाद हो जाते हैं
मेरी पीतल की गगरी का
सिर्फ इक घूंट पानी ही
तुम्हारे लिए स्वाति नक्षत्र की
बूँद जैसा बन जाता है

ओ कृष्णा..........मेरे प्यारे कृष्णा
मैं पागल ये भी न जान पाई कि

मेरा बस होना भर ही
तुम्हारी अतृप्त आत्मा को
जन्मों की तृप्ति दे जाता है____

गुंजन
२२/८/११

कई जन्म.....एक पल



कई जन्म लग गए
हमें तो अपनी रूह से मिलने में
और उसे एक पल भी नहीं लगा
जुदा होने में _______

गुंजन
21/8/11

Thursday, 18 August 2011

महीन शीशे से बने.......कुछ अधूरे-से सपने




जो कभी राह में तुम मिल जाओ
तो दूंगी तुम्हें..... वो सपने
जो कभी मेरे न हो सके

शायद तुम्हारे पंखों से लिपट के
उन्हें एक नया आसमान मिल सके
जिसके आयामों को नापते-नापते
उन्हें अपने सपने होने पर भरोसा हो सके

हाँ दूंगी तुम्हें.......मैं वो सपने
जो कभी मेरे ना हो सके
पर ध्यान रहे दोस्त
________

वो सपने हैं मेरे.........वो सपने हैं मेरे
महीन शीशे से बने
कुछ अधूरे-से सपने
ठिठुरते , कंपकपाते
माज़ी की इक गर्म रजाई में लिपटे हुए
ख़ाली बिस्तर की नर्म-नाज़ुक सिलवटों में
मेरे अकेलेपन के साथी

गुंजन
१७/८/११

Wednesday, 17 August 2011

गरम रजाई को ओढ़े हुए.....कुछ ठिठुरते हुए सपने




कुछ सपने धुन्द की रजाई
ओढ़े हुए ही रहना चाहते हैं

सुबह कब अपनी मरमरी बाहें फैलाये आ जाती है
औ रात कब नशीली हो जाती है
वो नहीं देखना चाहते
बल्कि वो इस मरमरी सुबह और नशीली रात को
जीना ही नहीं चाहते
क्यूंकि वो अपने ख्यालों से इतर
होना ही नहीं चाहते
__________

हाँ कुछ ऐसे ही हैं मेरे सपने
धुन्द की पतली-झीनी चादर को नहीं
बल्कि ख्यालों की
इक नरम, मुलायम
और गरम रजाई को ओढ़े हुए

जिसे न वो धो सकें और
न ही उसे किसी आज की अनचाही
खुरदुरी अलगनी पर सुखा सकें

ओह्ह ये सपने ...... मेरे प्यारे सपने

गुंजन
१७/८/११

Tuesday, 16 August 2011

अन्ना और गांधीजी .........




घर में कैद रहने की नहीं
अब बाहर निकलने की बारी है
ये बारिश नहीं
भारत माता की आँखों का पानी है

जिसे पोंछने आये 'अन्ना'
और उनसे जुड़े कुछ अपने जैसे
जो थे पहले अपने ही हाथों
अपने घर में कैदी जैसे

तो क्यूँ न अब हम भी
इन जंजीरों से आज़ाद हों
इस लिजलिजी सरकार के खिलाफ
हम भी 'अन्ना' के साथ हों

इस भ्रषटाचार रूपी अंग्रेजों का
अपने देश से करें बहिष्कार
बनकर वही 'सुभाष' और 'गाँधी'
स्थापित करें इक नयी सरकार

'गांधीजी' ने इक नारा दिया था
"अंग्रेजों भारत छोड़ो "
अब 'अन्ना' ने इक नारा दिया है
"भ्रषटाचार से मुहँ मोड़ो"

बदलाव तभी आयंगे
जब हम कुछ कर दिखने का
अपने अंदर "अन्ना" और "गांधीजी"
जैसा इक सिरफिरा-सा जूनून लायेंगे

गुंजन
१६/८/११