Tuesday, 14 June 2011
क्यूँ.... ?
क्यूँ आखिर......क्यूँ ?
ज़िन्दगी हरदम इतनी
हैरां रहा करती है
काटती रहती है
आपने आपको बिन बात
नदी के किनारे की तरह
पानी में उठती लहरों सी
बिन बात के डोला करती है
क्यूँ तेरी ख्वाइश करती है
क्यूँ तेरी तमन्ना करती है
बिन बात के हंसती है
बिन बात के रोती है
क्यूँ आखिर......क्यूँ
ज़िन्दगी इतनी परेशां
रहा करती है ?
.......गुंजन
Saturday, 11 June 2011
काश...काश के कोई लौटा दे
वो गली के मोड़ पर
टकराती हुई कुछ साईकलें
जिसमें छुपी होती थीं
प्यारे से दोस्तों की कुछ
कमीनी से मुस्कुराहटें
काश...काश के कोई लौटा दे
वो सलोने से चेहरे
वो दिलफरेब-सी आहटें
वो कच्चे अमरुद को देख
सधा गुलेल का निशाना
ओये-होए.... क्या खूब था
वो college का ज़माना
Coaching न होने पर भी
माँ से झूठा बहाना बनाना
वो classes में दोस्तों के साथ
Tables पीट-पीट के गाना गाना
काश......काश के कोई लौटा दे
वो भीगे से सावन में बेसाख्ता
किसी का नज़र आ जाना
वो एक कप चाय जिसको
पीते हम दोस्त-चार
जिसकी एक-एक घूंट को जीते थे
हम न जाने कितनी बार
वो लाला के समोसों को देख
टपकती-सी लार
काश...काश के कोई लौटा दे
वो घूंट भर की जिंदगी
वो समोसों के लिए
होती जूतम बाज़ार
वो ठिठुरती हुई सर्दियों की
भीगी सी शाम
जिसमें जीते थे हम
न जाने कितने मासूम-भरे अरमान
गुज़रते हुए वक़्त ने काहे छीन लिया
अपना वो प्यारा सा जहान
काश...काश के कोई लौटा दे
वो अनचीन्हे-से सपने
वो परियों का गुलिस्तान
गुंजन
11/6/11
Saturday
Friday, 10 June 2011
फ़ना.......
तेरी रूह से...मेरी रूह तक आती
ये सदा एक दिन मुझको
मुझसे फ़ना कर ले जाएगी
तू देखता ही रह जायेगा
उस पल को तब
जब न मैं होंगी
न मेरी आवाज़ तुझ तक जाएगी
ये बुतपरस्ती तेरी
ओ मेरे हमनवाज़
एक दिन तुझसे
मेरे होने का गुमां भी
छीन कर ले जाएगी
फारिग होकर ढूंढेगा
इस दुनिया में 'गुंजन' को जब
तब मेरी राख ही बस
तेरे दोनों हाथों में आएगी
तेरी रूह से....मेरी रूह तक आती
ये सदा एक दिन मुझको
मुझसे फ़ना कर ले जाएगी
गुंजन
12/5/2011
Thrusday
Thursday, 9 June 2011
कल की रात कुछ अजीब सी थी.........
कल की रात कुछ अजीब सी थी
दूर कहीं आवाज़ हुई थी
चाँद और तारों के टूटने की
एक आह भी सुनी थी
बहकी हुई हवा और जुगनू की
रजनीगंधा के मरे हुए फूलों की
खुशबू की चीत्कार भी
गूंजी थी- जेहन में.....
पर लगा कि नहीं ये तो बस
मेरा एक भ्रम है
जो हर रात उभरता है
मेरे अंतर्मन में
जिसको पीती हूँ रोज़
आंसुओं के रूप में.....
खुली आँखों से पनीले
सपनों को देखते हुए
गुज़रे हुए वक़्त की
दहलीज़ में झांकते हुए
मुट्ठीभर ख्वाइशों को
अंतस में संजोते हुए.....
वाकई कल की रात कुछ अजीब सी थी
गुंजन
9/6/11
Thrusday
Tuesday, 10 May 2011
न जाने कैसा था, वह मन....... ?
न जाने कैसा था - वह मन
जो शाम ढले ही
ढूंढा करता था तेरा आंगन
आलियों-गलियों ढूंढा करता
तुझको पल-छिन, पल-पल वह मन
सोंधी-सोंधी सी तेरी खुशबू में
जाने क्यूँ खोया रहता था- वह मन
न जाने कैसा था - वह मन
पथरीली राहों से तेरी
कंकर-पत्थर चुनता - वह मन
शाम ढले फिर दुल्हन जैसे
सज जाता था वह पागल मन
न जाने कैसा था - वह मन
राह तकता उस सुदूर गाँव की
जिसमें था तेरा वो आंगन
बुरुंश के लाल फूलों से रंगकर
देता था खुद को नवजीवन
न जाने कैसा था - वह मन
सीढ़ीनुमा उन खेतों में बो
देता था सपने वह पागल मन
दाडिम के उन वृक्षों के गिर्द
ढूंडा करता था वह अपना जीवन-धन
न जाने कैसा था - वह मन
ढोलक पर पड़ती थापों के बिच
छम-छम नाचा करता था- वह मन
लाल बुंदकी वाली चुनरी पहन
खुद पे ही इतराता था- वह मन
न जाने कैसा था - वह मन
दीप जला के इस तन का
दुल्हन-सा बन जाता था- वह मन
दुल्हन की उस सज्जा में फिर
'गुंजन' बन आतुर हो आता था - वह मन
न जाने कैसा था - वह मन
जो शाम ढले ही
ढूंढा करता था तेरा आंगन ।
गुंजन
26/3/2011
Monday
Thursday, 5 May 2011
'अक्स'
इन हाथों की लकीरें को देख कर ही तो-
जिन्दा हैं दोस्तों
वर्ना इस दुनिया में देखने को रखा क्या है ?
बुलाने से तो वो आता नहीं
ख्यालों में भी...'गुंजन'
शायद इन बेतरतीब-सी लकीरों में ही
उसका......'अक्स' नज़र आ जाये
उनके लिए जो कहते हैं ........किस्मत उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते
किस्मत में ही तो नहीं है.......वो हमारे
ये तो बस एक शुबा पाल रखा है
देखा था उसे इन लकीरों में, कभी कहीं
इसीलिए आज भी
इन लकीरों में 'गुंजन' ने
उसके होने का नामुमकिन-सा
ख्याल पाल रखा है .....
गुंजन
6/5/2011
Thrusday
Tuesday, 3 May 2011
माँ, अम्मा-बाबा ऐसा क्यूँ करते हैं ...?
आज मेरी 6 साल की बेटी ने मुझसे पुछा
माँ अम्मा-बाबा ऐसा क्यूँ करते हैं....?
भईया को देते हैं - इतना प्यार
और मुझे गोद में भी नहीं लेते हैं
क्या देती, मैं अपनी मासूम-सी जान के
इतने व्यस्क - से प्रश्न का ज़वाब
सुनकर मेरी आँख भर आई
दिल में इक हूक सी उठ आई
लाडो ये सिर्फ तेरी नहीं
हर बेटी की यही कहानी है
घर में बेटियों की ज़रूरत
अम्मा - बाबा ने सिर्फ
रक्षाबंधन औ भाईदूज पर ही जानी है
गुंजन
2/5/2011
Tuesday
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